Thu, 29 Oct 2026
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मां

 

माँ

अब बस थोड़ी दूर हो गई है,  

जैसे सूरज छत पर चमकता हो,  

पर हाथ बढ़ाओ तो छू न सको।  

 

अब भी हर रात फोन पर पूछती है—  

"खाना खाया?"  

और मैं हाँ कह देती हूँ,  

भले ही थाली अभी तक भरी पड़ी हो।  

 

अलमारी खोलते ही 

कोई सामान गिर पड़ता है,  

लगता है माँ अब भी  

सही से रखने की सीख दे रही है।  

 

अक्सर सब्ज़ी में कम नमक पड़ जाता है,  

तब एहसास होता है कि  

माँ की उंगलियाँ सिर्फ़ मसालों की नहीं,  

मोहब्बत का भी माप जानती थीं।  

 

माँ   

अब बस थोड़ी दूर हो गई है,  

पर जब भी मिलती हैं, वो मुझे देखकर यूँ खिल उठती है,  

जैसे सावन में पेड़ फिर से हरे हो जाते हैं।

 

 

कंचन "श्रुता"

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