ਜਿਸ ਨਗਰ ਨਿਗਮ ਦੀ ਸ਼ਹਿਰ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਸੁਥਰਾ ਰੱਖਣ ਦੀ ਉਸਦੇ ਮੇਨ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਅੰਦਰ ਬਾਥਰੂਮਾਂ ਦਾ ਬੁਰਾ ਹਾਲ ਹੈ ।
बचपन से सुना—
"लड़कियाँ सपने नहीं देखतीं,
उनका संसार चार दीवारों तक सीमित होता है।"
माँ की आँखों में कई सवाल देखे,
पर उनके लब खामोश थे।
मैं .. कभी गुड़ियों संग खेली,
तो कभी जिम्मेदारियों में उलझी।
किताबें थामीं, तो किसी ने कहा—
"रसोई ही तेरा असली संसार है।"
मन में ख्वाइशों का शोर था , पर जुबां चुप थी,
हर दिन सपनों को दबाती रही।
पर एक दिन, दिल ने कहा—
"अब और नहीं!"
और फिर
मैंने खुद को चुना,
डर को पीछे छोड़ा।
राहों में मुश्किलें मिलीं , पर ..मैं बढ़ती गई,
हर चुनौती को अपनी ताकत बनाती गई।
आज मैं वही हूँ, पर अलग हूँ।
अब चार दीवारें मेरी हद नहीं,
अब मैं अपने सपने जिया करती हूं ।
फैसला कर लिया मैंने —
अब मैं जीऊँगी, खुद के लिए भी!
कंचन "श्रुता"






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