Thu, 29 Oct 2026
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अजीब शख़्स था उसको समझाना मुश्किल है

अजीब शख़्स था उस को समझना मुश्किल है

किनार-ए-आब खड़ा था मगर वो प्यासा था

खलील तनवीर

 

सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा

मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर

ज़फ़र इक़बाल

 

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी

जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

 

कौन किसी का ग़म खाता है

कहने को ग़म-ख़्वार है दुनिया

मोहम्मद रफ़ी सौदा

 

इश्क़ और अक़्ल में हुई है शर्त

जीत और हार का तमाशा है

सिराज औरंगाबादी

 

नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही

ये खिड़की खोलो ज़रा सुब्ह की हवा ही लगे

बशीर बद्र

 

वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में 'मुनीर'

आज कल होता गया और दिन हवा होते गए

मुनीर नियाज़ी

 

आसमानों में उड़ा करते हैं फूले फूले

हल्के लोगों के बड़े काम हवा करती है

मोहम्मद आज़म

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