Friday, 30 Jan 2026

मैंने बचपन में अधूरा ख्वाब देखा था कोई

मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई

आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में

आलम ख़ुर्शीद

 

हिज्र की रात और पूरा चाँद

किस क़दर है ये एहतिमाम ग़लत

अलीना इतरत

 

मार डाला तिरी आँखों ने हमें

शेर का काम हिरन करते हैं

हातिम अली मेहर

 

अब किसी भी मौत पर थोड़ा-सा मर जाते हैं हम

जीना आसाँ हो गया मरने की तय्यारी के बाद

- राजेश रेड्डी

 

तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से

वो इतना पूछ लें मुझ से तो फ़िर किस बात का ग़म है

-मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़

 

बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो

ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो

मीर तक़ी मीर

 

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता

न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता

चकबस्त बृज नारायण

 

नाकामियों ने और भी सरकश बना दिया

इतने हुए ज़लील कि ख़ुद्दार हो गए !

~ कर्रार नूरी


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