Friday, 30 Jan 2026

गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति,

गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति,
                ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः ।
                आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति नद्यः ,
                समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेया  

गुण गुणियों में रहकर ही गुण होते है ,निर्गुण को प्राप्त करके वह दोषयुक्त हो जाते है। नदियों के जल तभी तक स्वादिष्ट (पीने योग्य) होते है। जब तक बहते रहते है,समुद्र को प्राप्त करके वे अपेय (न पीने योग्य) हो जाते है।

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प्रशंसा से पिघलना नहीं  आलोचना से उबलना नहीं । नि:स्वार्थ भाव से कर्म लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संगतिम् ॥

जिस स्थान पर आजीविका न मिले, लोगों में भय, और लज्जा, उदारता तथा दान देने की प्रवृत्ति न हो, ऐसी पांच जगहों को भी मनुष्य को अपने निवास के लिए नहीं चुनना चाहिए ।

करते रहें। क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जाएगा. ..

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लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संगतिम् ॥

जिस स्थान पर आजीविका न मिले, लोगों में भय, और लज्जा, उदारता तथा दान देने की प्रवृत्ति न हो, ऐसी पांच जगहों को भी मनुष्य को अपने निवास के लिए नहीं चुनना चाहिए ।


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