सर पर ये जो छत का साया होता है
दीवारों ने बोझ उठाया होता है
फख़्र अब्बास
ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और
लोग अपने घरों में सोए थे
अख़्तर रज़ा सलीमी
पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा
हम जवाब क्या देते खो गए सवालों में
बशीर बद्र
मैंने उसको इतना देखा, जितना देखा जा सकता था
लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था
अज्ञात
सदियों के बाद होश में जो आ रहा हूँ मैं
लगता है पहले जुर्म को दोहरा रहा हूँ मैं
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
निदा फ़ाज़ली
ख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है
ख़्वाहिशें हैं सदियों की उम्र तो ज़रा सी है
सरवत ज़ेहरा
दिल जलाओ या दिए आँखों के दरवाज़े पर
वक़्त से पहले तो आते नहीं आने वाले
सदा अम्बालवी






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