Friday, 30 Jan 2026

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी जिस को भी देखना हो कई बार देखना

सर पर ये जो छत का साया होता है

दीवारों ने बोझ उठाया होता है

फख़्र अब्बास

 

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

लोग अपने घरों में सोए थे

अख़्तर रज़ा सलीमी

 

पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा

हम जवाब क्या देते खो गए सवालों में

बशीर बद्र

 

मैंने उसको इतना देखा, जितना देखा जा सकता था

लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था

अज्ञात

 

सदियों के बाद होश में जो आ रहा हूँ मैं

लगता है पहले जुर्म को दोहरा रहा हूँ मैं

ज़ुल्फ़िकार नक़वी

 

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली

 

ख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है

ख़्वाहिशें हैं सदियों की उम्र तो ज़रा सी है

सरवत ज़ेहरा

 

दिल जलाओ या दिए आँखों के दरवाज़े पर

वक़्त से पहले तो आते नहीं आने वाले

सदा अम्बालवी


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