Mon, 14 Sep 2026
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अथर्ववेद में धर्म का अर्थ धार्मिक आचार से प्राप्त होने वाला पुण्य है : योगिराज रमेश जी

         ---------- धर्म क्या है? ----------


ऋग्वेद में धर्म शब्द का लगभग 56 बार उच्चारण हुआ है पोषण करना इस अर्थ में भी धर्म शब्द का प्रयोग हुआ है नैतिक नियम के लिए भी धर्म शब्द का प्रयोग हुआ है।
अथर्ववेद में धर्म का अर्थ धार्मिक आचार से प्राप्त होने वाला पुण्य है छांदोग्य उपनिषद में चारों आश्रम के क्या कर्तव्य हैं इस अर्थ में धर्म शब्द का उपयोग किया गया है।
सत्यं वद धर्मं चर
सत्य बोलते हुए धर्मानुसार जीवन जियो यह धर्म का अर्थ कहा गया हैः
आश्वलायन गृह्यसूत्र में धर्म के लिए कहा गया है कि धारणात श्रेय आदधाति इति धर्मः
जिसके नियमानुसार चलने पर मानव का कल्याण होता है यश प्राप्त होता है उन्नति होती है और मोक्ष प्राप्त होता है उसे धर्म कहते हैं।
ऋषि याज्ञवल्क्य करते हैंः
वेद स्मृति शिष्ट सज्जनों के आचरण उनके उपदेश के अनुसार और अपनी बुद्धि के अनुसार आत्म संतोष के अनुसार अपना आचरण रखना चाहिए।
महाभारत में धर्म के लिए करते हैं कि प्राणियों के कल्याण के लिए उनके अभ्युदय के लिए धर्म का कथन किया गया है जिससे श्रेयस सिद्धि हो वही धर्म है।
जिससे जिस शक्ति से संपूर्ण सृष्टि क्रिया का रक्षण संरक्षण हो रहा है उस तत्व का नाम धर्म है।
जिसके आचरण से मन हृदय विकसित होता है उस तत्व का नाम धर्म है।
नारायण उपनिषद में धर्म के लिए कहा गया है कि धर्मों विश्वस्य जगतः
प्रतिष्ठा धर्मं सरवम प्रतिष्ठितम
धर्म समस्त संसार की स्थिति का मूल है धर्म से समग्र संसार स्थित है।
वेदांत दर्शन के प्रणेता व्यास जी के मत में अंतःकरण की पवित्रता जैसे हो ऐसे कर्म को धर्म कहते हैं धर्म के अनुष्ठान से वासनाएं मर्यादा में रहती हैं व्यास जी ने लोकहितकारी कर्म को धर्म कहा है।
धर्माचार्य मनु ने 10 पदार्थों के धारण करने को धर्म कहा है धृति क्षमा दम अस्तेय शौच इंद्रियनिग्रह धी विद्या सत्य अ क्रोध।
देवर्षि नारद के मत से महापुरुषों के आज्ञा अनुसार कर्म ही धर्म है।
वेदव्यास जी ने धर्म शब्द की व्याख्या ने कहा उस महान धर्म को प्रणाम है जो समस्त मनुष्यों को धारण करता है सभी को धारण करने वाले जो नियम हैं वह धर्म हैं।
आगे व्यास जी ने कहा राज्य की जड मूल धर्म पर है। और लोगों का सारा जीवन राज्य पर आधारित है राज्य धर्म पर और धर्म राज्य पर आधारित हैः
महर्षि कणाद ने धर्म के लक्षण के लिए कहा जिससे इस लोक में अभ्युदय परलोक में मोक्ष की प्राप्ति हो उसे धर्म कहा जाता हैः
आज हमारे नेता शासक सब धर्म के बारे में कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं जबकि धर्म का रंचमात्र ज्ञान उनको नहीं है कि धर्म क्या है धर्मनिरपेक्ष यानी धर्म न हो इसका क्या मतलब है धर्म क्या है इसको यदि यह समझ लेते तो आज देश इस दुर्दशा को प्राप्त ना होता जिस दुर्दशा में हम जी रहे हैं ।
योगीराज रमेश जी महाराज

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