Thursday, 29 Jan 2026

काव्य संकलन "श्रुता"

ख्वाहिशों का काफिला भी बड़ा अजीब है 'फ़राज़'

अक्सर वहीं से गुज़रता है जहां रास्ता ना हो।

अहमद फ़राज़

 

मंज़िलें लाख कठिन आएँ गुज़र जाऊँगा

हौसला हार के बैठूँगा तो मर जाऊँगा

साक़ी अमरोहवी

 

बड़ी भोली है ख़र्चीली ज़रूरत

शहंशाही कमाई माँगती है

खुर्शीद अकबर

 

हमारे कमरे में उस की यादें नहीं हैं 'फ़ाज़िल'

कहीं किताबें कहीं रिसाले पड़े हुए हैं

फ़ाज़िल जमीली

 

दोस्ती से तजुर्बा यह हो गया 

दुश्मनों से प्यार करना चाहिए

(अंजुम रहबर)


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