जो "व्यक्ति" किसी दूसरे के चेहरे पर हंसी
और जीवन में खुशियां लाने की क्षमता रखता है "ईश्वर" उसके चेहरे से कभी हंसी और जीवन से खुशियां कम नहीं होने देता । "स्वयं" के जीवन में अगर हम दूसरे की सफलता को स्वीकार नहीं करते तो, वह "ईष्र्या" बन जाती है और अगर स्वीकार करले तो वह "प्रेरणा" बन जाती है "मुस्कुराहट" कहां से आती है मुझे नहीं पता, पर जहां भी होती है वहां यह "दुनिया" और भी "खूबसूरत" होने लगती है....



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