जिला प्रधान संजय तलबाड ने जिला कांग्रेस कमेटी (शहरी) लुधियाना की मासिक बैठक का आयोजन ।
---- मेरी तरफ़ से ----
{ लेखक का राम इंसाफ़ का बेइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ खड़े होने का सन्देश
{लेखक राम सिंह इंसाफ़ विचार सांझा करते हुए और अपना गुनाह क़बूल करते हुए }
हम आम तौर पर सुनते आ रहे हैं कि समाज का ढांचा बहुत बिगड़ गया है। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार हर जगह व्याप्त है। बड़े पैमाने पर बदमाशी और उत्पीड़न हो रहा है। झूठे मुकाबले बना कर निर्दोष लोगों की हत्या की जा रही है। सरकारें वेख़ोफ़ हो कर लूट रही हैं, कोई अपील दलील नहीं, हर तरफ गुंडागर्दी फैल रही है । खाद्य पदार्थों में मिलावट, कालाबाजारी, जमाखोरी और आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। डकैती, हत्या, घोटाले, जबरन वसूली, बलात्कार की खबरें सभी अखबारों की आम सुर्खियां हैं।
कई धार्मिक स्थल राजनीति का अड्डा बन गये हैं। बेरोजगारी और कर्ज के कारण मजदूरों, किसानों और युवाओं की आत्महत्या की खबरें आम हैं। इस समाज में बेटियों को पैदा होने से पहले ही मार देना आम बात हो गई है। मनुष्य ने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, जिससे पृथ्वी, जल और वायु बुरी तरह प्रदूषित हो गये हैं।
प्रदूषण एक लाइलाज बीमारी की तरह समाज के हर क्षेत्र में फैल चुका है। उचित मार्गदर्शन के अभाव में बच्चों और युवाओं की गलत दिशा में जाने की प्रवृत्ति आम चर्चा का विषय है। हर तरफ बेचैनी देखी जा रही है । आम लोगों के चेहरे पर बनावटी सी मुस्कान साफ नजर आती है, सरकारों के ख़राब प्रबंधन और जीवन में असुरक्षा की भावना के कारण लोग विदेश जाने को मजबूर हैं।
सरकारी और गैर-सरकारी गुंडागर्दी इतनी बढ़ गई है कि अमीर से लेकर गरीब तक सभी लोग आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं और एक भारी डर के तले खुद को इतना प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं कि सच बोलने को भी तैयार नहीं हैं। सबसे दुखद और आश्चर्य की बात तो यह है कि समाज को पतित समाज बताने वाला कोई भी व्यक्ति समाज से बाहर रह कर बात करता नजर आता है। जब तक हम यह पता नहीं लगा लेते कि समाज की गिरावट का कारण क्या है, इसके लिए दोषी कौन है, तब तक समाज के सही या गलत के बारे में कोई भी तर्क पुख़्ता नहीं कहा जा सकता। जब किसी बीमारी का कारण पता चल जाए तो उसका इलाज संभव हो सकता है।
अफसोस की बात है कि लोग सरकारें तो खुद चुनते हैं और फिर उनसे हाथ फैला कर मांगें करने लगते हैं और उनके दरों पर रूलते फिरते नजर आते हैं। जनता ने निर्वाचित उम्मीदवारों, सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को यह भुला दिया कि वे जनता के सेवक हैं। लोग कहते हैं कि रिश्वतखोरी है, चोरी हैं पुलिस वाले गुंडे हैं, नेता झूठे हैं, चोर हैं, अमानवीय हैं, बेशर्म हैं, बदमाश हैं, लेकिन अगर कोई जनता से पूछे कि क्या आपने वोटों की कीमत तो नहीं वसूली ? क्या आपने किसी को रिश्वत तो नहीं दी ? क्या आपने असामाजिक तत्वों को सेल्यूट तो नहीं मारा ?, क्या आपने झूठे भाषण पर ताली तो नहीं बजाई ?, क्या आप उन लोगों में से तो नहीं हैं जो दहेज के कारण बहुओं को ज़ला देते हैं ? और बेटियों को जन्म लेने से पहले ही गर्भ में मार देते हैं ? मान लीजिए कि आप उनमें से नहीं हैं, तो क्या आप यह सब जानकर चुप तो नहीं रहे ? या किसी डर की वजह से बैठे तो नहीं रहे ? यदि हां, तो आप इस तरह के अत्याचार करने वालों से भी आप अधिक दोषी हो ।इस वजह से आप अपराधियों की श्रेणी में खड़े होने से बच नहीं सकते. क्योंकि समाज में जितने भी गन्दे तत्व आप अपने मुंह से मानते हो वे सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आपकी ही रचना हैं और ये सभी आपके मौन के आधार स्तंभ हैं।
समाज में सबसे बड़ी त्रासदी अगर कोई है तो वह यह है कि अधिकार तो हर कोई चाहता है लेकिन अपने कर्तव्यों को पूरी तरह भूल जाता है। जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारी, अधिकारी, सरकारें सभी अधिकारों का खुलकर उपयोग करते हैं, बल्कि उनका दुरुपयोग करते हैं, लेकिन कर्तव्यों को कोठरी में ताला लगाकर रखते हैं। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर के सरकार तो चुन लेती है, लेकिन सरकार को लूटते हुए देख कर चुप रहना कर्तव्य की घोर अवहेलना और महापाप है। जब आप लुटेरे के समूह के सरदार को सलाम करते हैं और गरीब और शरीफ आदमी को आदमी ही नहीं समझते, जब आपके बच्चे यह सब देखेंगे तो क्या वे सलाम करने वालों में शामिल होना चाहेंगे या सलाम लेने वालों में शामिल होना चाहेंगे? सलामी लेने वालों की कतार में शामिल होने के लिए वे कोई भी नीच असामाजिक कृत्य करने को तैयार होंगे। क्या आप समाज में इस तरह की पनीरी का वीज कर समाज को खुश देखना चाहते हैं?, क्या आप बच्चों को खुश देखना चाहते हैं?, क्या आप आराम से सोना चाहते हैं?, क्या आप बुढ़ापे को अच्छा व्यतीत करना चाहते हैं? ऐसा कतई संभव नहीं हो सकता क्योंकि आप जो बोएंगे वही काटेंगे। आप अपने बच्चों को अंधकार और अपमान के जीवन में धकेलने के लिए सरासर ज़िम्मेवार हैं। हम सभी को इन पापों के लिए जवाब देना होगा।
आईए गंभीरता से सोचें, अपने और अपने बच्चों पर कुछ तो दया करते हुए, हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं और हमें अपने महापुरुषों और शहीदों की सोच पर पहिरा देते हुए विना किसी शर्म या झिझक के अपने गुनाहों को स्वीकार करके लंबी चुप्पी को तोड़ते हुए आज से ही बढ़िया समाज के सृजन के लिए यत्तनशील होना होगा ।
आपका गुनहगार
राम सिंह इंसाफ़


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