Thu, 05 Nov 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

हम इतना चाहते थे एक दूसरे को 'ज़फ़र'

मैं उस की और वो मेरी मिसाल हो के रहा

 

साबिर ज़फ़र

 

आज रक्खे हैं क़दम उस ने मिरी चौखट पर

आज दहलीज़ मिरी छत के बराबर हुई है

 

सलीम सिद्दीक़ी

 

जिसे न आने की क़स्में मैं दे के आया हूँ

उसी के क़दमों की आहट का इंतिज़ार भी है

 

जावेद नसीमी

 

 मुद्दत हुई कि ज़िंदा हूँ देखे बग़ैर उसे

वो शख़्स मेरे दिल से उतर तो नहीं गया

 

जावेद नसीमी

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