Friday, 30 Jan 2026

काव्य संकलन "श्रुता"

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर,

फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ 

 

शकील बदायुनी

 

 

रूह के इस वीराने में तेरी याद ही सब कुछ थी

आज तो वो भी यूँ गुज़री जैसे ग़रीबों का त्यौहार

 

मुस्तफ़ा ज़ैदी

 

 

फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ

आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं

 

शारिक़ कैफ़ी

 

 

सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए

एक दिन उस से भी झगड़ा कर लिया


40

Share News

Login first to enter comments.

Latest News

Number of Visitors - 133043