Sun, 20 Sep 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

*साहिर होशियारपुरी*

 

 

कौन कहता है मोहब्बत की ज़बाँ होती है 

ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है 

 

वो न आए तो सताती है ख़लिश सी दिल को 

वो जो आए तो ख़लिश और जवाँ होती है 

 

रूह को शाद करे दिल को जो पुर-नूर करे 

हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है 

 

ज़ब्त सैलाब-ए-मोहब्बत को कहाँ तक रोके 

दिल में जो बात हो आँखों से अयाँ होती है 

 

ज़िंदगी एक सुलगती सी चिता है 'साहिर' 

शो'ला बनती है न ये बुझ के धुआँ होती है

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