Friday, 30 Jan 2026

काव्य संकलन

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

 

पहुँचा है बुज़ुर्गों के बयानों से जो हम तक

क्या बात हुई क्यूँ वो ज़माना नहीं आता

 

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख न पाया

उस को भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता

 

इस छोटे ज़माने के बड़े कैसे बनोगे

लोगों को जब आपस में लड़ाना नहीं आता

 

ढूँढे है तो पलकों पे चमकने के बहाने

आँसू को मिरी आँख में आना नहीं आता

 

तारीख़ की आँखों में धुआँ हो गए ख़ुद ही

तुम को तो कोई घर भी जलाना नहीं आता

 

वसीम बरेलवी


112

Share News

Login first to enter comments.

Latest News

Number of Visitors - 133043