Sat, 02 May 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

आती है धार उन के करम से शुऊर में
दुश्मन मिले हैं दोस्त से बेहतर कभी कभी

आल-ए-अहमद सुरूर

जितनी आँखें थीं सारी मेरी थीं
जितने मंज़र थे सब तुम्हारे थे

नईम जर्रार अहमद

बहती रही नदी मिरे घर के क़रीब से
पानी को देखने के लिए मैं तरस गया

इफ़्तिख़ार नसीम

मैं शीशा क्यूँ न बना आदमी हुआ क्यूँकर
मुझे तो उम्र लगी टूट फूट जाने तक

इफ़्तिख़ार नसीम


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