Mon, 16 Mar 2026
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*अजन्मी बेटी की वेदना* : डॉक्टर कंचन श्रुता

*अजन्मी बेटी की वेदना*????

अर्शों से जब आई  बेटी ,
कितने सपने  लाई  बेटी ,
कोख़ में गर बच भी गयी  ,
 क्यों जन्म के बाद भी 
दी गई मारी बेटी ।

क्या बेटी होना कसूर है मेरा  ,
 क्यों कुचल दिए जज़्बात मेरे  ,
जीवन दे के छीन लिए क्यों ,
नन्हे नन्हे  ख़्वाब मेरे ।
मुझको भी गर मौका मिलता  ,
जीवन सिंधु मैं तर लेती ,
खुद को मैं भी साबित करती  ,
हां मैं भी इक जीवन जीती ।

बेटी से ही सम्भव है  ,
रिश्तों की बौछार  ,
बेटी है तो बहन है जग में ,
बेटी से ही माँ का दुलार ,
बेटी है तो दादी नानी  ,
बुआ मौसी का प्यार  ,
बेटी से सब रिश्ते नाते ,
बेटी से संसार ।

बिन बेटी न तीज त्योहार  ,
न ही जीवन का उद्धार ,
बेटी है तो उत्सव जीवन ,
जैसे  हर दिन हो साकार  ,
बेटी है अभिमान पिता का ,
है मां की निश्छल साया  ,
बेटी से ही है उजियारा  ,
जो दो दो घरों में है आया  ।


बिन बेटी न सम्भव होगा ,
जीवन दुनिया और संसार ,
बन्द हो भ्रूण हत्या और  ,
हतियारों का ये कारोबार  ,
बेटी का जो खिला न जीवन ,
मिलेगी कैसे माँ की ममता ,
और बहन - पत्नी  का प्यार ।

बेटी है तो जीवन है बेटी से संसार ।
बेटी है तो जीवन है बेटी से संसार ।

*डॉ. कंचन "श्रृता"*


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