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बलिदान देना मंजूर था, पर सनातन धर्म छोड़ना नहीं, ऐसी महान बलवीर हकीकत राय को शत शत नमन : किशनलाल शर्मा।
पंडित दीनदयाल उपाध्या स्मृति मच की और से भारत माता के महान सपूत वीर हकीकत राय जी का मनाया बलिदान दिवस।
जालंधर, 14 फ़रवरी ( ) : पंडित दीनदयाल उपाध्या स्मृति मच की और से भारत माता के महान सपूत वीर हकीकत राय जी का बलिदान दिवस किशनपुरा क्षेत्र में मनाया गया कार्यक्रम का शुभारम्भ देश भक्ति का गीत बलिदान कहाँदा है देश ते मरना धर्म ते मरना अजमेर सिंह बादल ने गा कर किया। इस अवसर पर मंच के पंडित दीनदयाल उपाध्या स्मृति मच पंजाब प्रधान किशनलाल शर्मा ने कहा कि भारत वह वीरभूमि है, जहाँ हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने वालों में छोटे - 2 बच्चे भी पीछे नहीं रहे। 1719 में स्यालकोट (वर्त्तमान पाकिस्तान) के निकट एक ग्राम में श्री भागमल खत्री के घर जन्मा हकीकतराय ऐसा ही एक धर्मवीर था और कहा हकीकतराय के माता-पिता धर्मप्रेमी थे, अतः बालपन से ही उसकी रुचि अपने पवित्र धर्म के प्रति जाग्रत हो गयी। उसने छोटी अवस्था में ही अच्छी संस्कृत सीख ली। उन दिनों भारत में मुस्लिम शासन था। अतः अरबी-फारसी भाषा जानने वालों को महत्त्व मिलता था, इसी से हकीकत के पिता ने 10 वर्ष की अवस्था में फारसी पढ़ने के लिए उसे एक मदरसे में भेज दिया, बुद्धिमान हकीकत वहाँ भी सबसे आगे रहता था, इससे अन्य मुस्लिम छात्र उससे जलने लगे, वे प्रायः उसे नीचा दिखाने का प्रयास करते थे; पर हकीकत सदा अध्ययन में ही लगा रहता था, एक बार मौलवी को किसी काम से दूसरे गाँव जाना था। उन्होंने बच्चों को पहाड़े याद करने को कहा और स्वयं चले गये। उनके जाते ही सब छात्र खेलने लगे; पर हकीकत एक ओर बैठकर पहाड़े याद करता रहा। यह देखकर मुस्लिम छात्र उसे परेशान करने लगे। इसके बाद भी जब हकीकत विचलित नहीं हुआ, तो एक छात्र ने उसकी पुस्तक छीन ली, यह देखकर हकीकत बोला - तुम्हें भवानी माँ की कसम है, मेरी पुस्तक लौटा दो। इस पर वह मुस्लिम छात्र बोला - तेरी भवानी माँ की ऐसी की तैसी। हकीकत ने कहा - खबरदार, जो हमारी देवी के प्रति ऐसे शब्द बोले। यदि मैं तुम्हारे पैगम्बर की बेटी फातिमा बी के लिए ऐसा कहूँ, तो तुम्हें कैसा लगेगा ? लेकिन वह तो लड़ने पर उतारू था। अतः हकीकत उसकी छाती पर चढ़ बैठा और मुक्कों से उसके चेहरे का नक्शा बदल दिया। उसका रौद्र रूप देखकर बाकी छात्र डर कर चुपचाप बैठ गये, थोड़ी देर में मौलवी लौट आये। मुस्लिम छात्रों ने नमक-मिर्च लगाकर सारी घटना उन्हें बतायी। इस पर मौलवी ने हकीकत की पिटाई की और उसे सजा के लिए काजी के पास ले गये। काजी ने इस सारे विवाद को लाहौर के बड़े इमाम के पास भेज दिया। उसने सारी बात सुनकर निर्णय दिया कि हकीकत ने इस्लाम का अपमान किया है। अतः उसे मृत्युदण्ड मिलेगा; पर यदि वह मुसलमान बन जाये, तो उसे क्षमा किया जा सकता है, बालवीर हकीकत ने सिर ऊँचा कर कहा - मैंने हिन्दू धर्म में जन्म लिया है और हिन्दू धर्म में ही मरूँगा। मौलवियों ने उसे और भी कई तरह के प्रलोभन दिये। हकीकत के माता-पिता और पत्नी भी उसे धर्म बदलने को कहने लगे, जिससे वह उनकी आँखों के सामने तो रहे; पर हकीकत ने स्पष्ट कह दिया कि व्यक्ति का शरीर मरता है, आत्मा नहीं। अतः मृत्यु के भय से मैं अपने पवित्र हिन्दू धर्म का त्याग नहीं करूँगा, अन्ततः 1734 में वसन्त पंचमी के दिन उस धर्मप्रेमी बालक का सिर काट दिया गया। जब जल्लाद सिर काटने के लिए बढ़ा, तो हकीकतराय के तेजस्वी मुखमण्डल को देखकर उसके हाथ से तलवार छूट गयी। इस पर हकीकत ने उसे अपना कर्त्तव्य पूरा करने को कहा। कहते हैं कि सिर कटने के बाद धरती पर न गिर कर आकाश मार्ग से सीधा स्वर्ग में चला गया। उसी स्मृति में वसन्त पंचमी को आज भी पतंगें उड़ाई जाती हैं। इस अवसर पर बावा वर्मा, तजिंदर शर्मा, राजवीर सिंह, गुरमैल सिंह, मंगलसेन, राजेश बंटी, नवीन भल्ला, बलबीर सिंह, अभी थापर, रोहित राय, विक्की सोनी आदि भरी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे।
कैप्शन : वीर हकीकतराय के चित्र पर श्रदासुमन अर्पित करते किशनलाल शर्मा, बावा वर्मा, अजमेर सिंह बादल, राजेश बंटी व अन्य। ( )

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