विश्लेषण : आस्था के टेंट में सियासत की चिंगारी और जालंधर सेंट्रल का 'पावर गेम'
सियासत में जब धार्मिक आयोजन 'शक्ति प्रदर्शन' का जरिया बन जाएं, तो टेंट उखड़ने के साथ-साथ कई राजनीतिक समीकरण भी उखड़ जाते हैं। जालंधर के साईं दास स्कूल ग्राउंड में श्री कष्ट निवारण बालाजी मंदिर कमेटी द्वारा आयोजित भगवान बालाजी की धार्मिक चौकी पर बाद उपजा विवाद महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह असल में जालंधर सेंट्रल हलके में चल रही उस भीतरी सियासी जंग का नतीजा है, जो अब खुलकर चौराहे पर आ गई है। अपनी ही सरकार की पुलिस के खिलाफ विधायक रमन अरोड़ा का सरकारी सुरक्षा लौटाना और सड़क पर उतरना यह साफ करता है कि आम आदमी पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
नितिन कोहली बनाम रमन अरोड़ा: वर्चस्व की यह जंग कितनी गहरी?
जालंधर की राजनीतिक गलियारों में इस पूरे विवाद को सीधे तौर पर 'नितिन कोहली बनाम रमन अरोड़ा' के रूप में देखा जा रहा है। रमन अरोड़ा भले ही मौजूदा विधायक हैं, लेकिन लंबे समय बाद किसी धार्मिक आयोजन के होर्डिंग्स पर उनकी वापसी ने उनके विरोधियों को चौकन्ना कर दिया। चर्चाएं आम हैं कि जालंधर सेंट्रल हलके में इस समय पार्टी की कमान और हाईकमान का वरदहस्त पूरी तरह से नितिन कोहली के पास है। ऐसे में विधायक अरोड़ा का खुद को अलग-थलग महसूस करना और अपनी राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने के लिए इस धार्मिक मंच का सहारा लेना, उनके प्रतिद्वंदियों को रास नहीं आया। हाल ही में बाजार में कार्ड बांटने के दौरान दीपक बाली द्वारा फोटो खिंचवाने से किया गया साफ इनकार यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर विधायक अरोड़ा को दरकिनार करने की स्क्रिप्ट काफी समय से लिखी जा रही थी।
जालंधर सेंट्रल में आखिर पावर किसके हाथ?
इस विवाद ने जनता के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है 'जालंधर सेंट्रल में आखिर असली पावर किसके हाथ में है?' लोकतांत्रिक व्यवस्था में अमूमन विधायक को हलके का 'बॉस' माना जाता है, लेकिन जब पुलिस प्रशासन विधायक की ही देखरेख में हो रहे आयोजन को रोक दे और कमिश्नर धनप्रीत कौर सीधे तौर पर अनुमति न होने की बात कहें, तो सत्ता का केंद्र बदला हुआ नजर आता है। विधायक रमन अरोड़ा का यह बयान कि 'जो पुलिस भगवान के काम को रोके, मैं उसकी सुरक्षा नहीं रखूंगा', उनकी लाचारी और गुस्से को साफ बयां करता है। यह स्थिति बताती है कि प्रशासनिक तंत्र पर अब मौजूदा विधायक से ज्यादा किसी और का नियंत्रण या प्रभाव काम कर रहा है।
निष्कर्ष: धार्मिक आस्था पर भारी पड़ी अंदरूनी कलह
साईं दास स्कूल ग्राउंड में बालाजी की चौकी ने आम आदमी पार्टी के भीतर अनुशासन के दावों की हवा जरूर निकाल दी है। जब एक सिटिंग विधायक को अपनी बात मनवाने के लिए सुरक्षा छोड़नी पड़े और विरोधी खेमा पूरी तरह चुप्पी साधकर तमाशा देखे, तो नुकसान सिर्फ नेता का नहीं, बल्कि पार्टी की छवि का होता है। जालंधर सेंट्रल की यह 'पावर प्रजेंटेशन' यह साफ संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में यहां की सियासत और भी गरमाने वाली है, जहां जंग विरोधियों से बाद में, पहले अपनों से ही लड़नी है।

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