इस्लामाबाद में 21 घंटों तक चली मैराथन वार्ता का बिना किसी नतीजे के समाप्त होना वैश्विक शांति के लिए एक बड़ा झटका है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस का खाली हाथ लौटना और यह कहना कि 'यह ईरान के लिए बुरी खबर है', वाशिंगटन के सख्त और अड़ियल रुख को दर्शाता है। दूसरी ओर, तेहरान का यह तर्क कि अमेरिकी शर्तें अनुचित और अत्यंत कठोर हैं, यह साफ करता है कि कूटनीति के बंद कमरों में दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है। पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका तो निभाई, लेकिन दोनों देशों के बीच की वैचारिक खाई इतनी गहरी थी कि उसे पाट पाना फिलहाल मुमकिन नहीं दिखा।
परमाणु कार्यक्रम: समझौते की सबसे बड़ी दीवार
वार्ता के विफल होने का सबसे प्रमुख कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना रहा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि उनके लिए किसी भी समझौते का 99 प्रतिशत हिस्सा केवल यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा और मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए अनिवार्य मानता है, जबकि वेंस ने ईरान पर इस दिशा में ठोस प्रतिबद्धता न दिखाने का आरोप लगाया है। अमेरिका की नजर में ईरान का परमाणु हथियार संपन्न होना एक 'रेड लाइन' है जिसे वह किसी भी कीमत पर पार नहीं होने देना चाहता।
ईरान का पक्ष अपनी संप्रभुता और वैज्ञानिक तकनीक के अधिकार पर टिका हुआ है। परमाणु एजेंसी के प्रमुख मोहम्मद इस्लामी का यह कहना कि यूरेनियम संवर्धन उनका अधिकार है, वार्ता की मेज पर एक बड़ी अड़चन साबित हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार, परमाणु कार्यक्रम ईरान के लिए केवल एक रक्षात्मक रणनीति नहीं, बल्कि उसकी शासन व्यवस्था की विचारधारा का हिस्सा है। ऐसे में, बिना किसी बड़ी छूट या सुरक्षा गारंटी के इस कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना ईरान के लिए कूटनीतिक आत्मसमर्पण जैसा महसूस होता है।
होर्मुज का जलक्षेत्र: संप्रभुता बनाम व्यापारिक नियंत्रण
परमाणु विवाद के बाद दूसरा बड़ा पेंच होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर फंसा है। जहाँ ट्रम्प ने साझा टोल वसूली और समुद्री रास्ते से बारूदी सुरंगें साफ करने का दावा किया था, वहीं ईरान इस रणनीतिक जलक्षेत्र पर अपने पूर्ण संप्रभु नियंत्रण के दावे से पीछे हटने को तैयार नहीं है। हाल ही में अमेरिकी युद्धपोतों को दी गई चेतावनी और ईरानी सेना के सख्त बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह जलमार्ग केवल व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन चुका है। ईरान होर्मुज को अपनी सबसे बड़ी 'भौगोलिक ताकत' मानता है और इसे वह इतनी आसानी से नहीं छोड़ेगा।
इस कूटनीतिक असफलता में दोनों देशों के नेतृत्व के स्वभाव और रणनीतियों का अंतर भी खुलकर सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल, विशेषकर जे.डी. वेंस, जहाँ किसी त्वरित समाधान और तत्काल 'डील' के पक्ष में दिखे, वहीं ईरानी पक्ष 'देखो और इंतजार करो' की नीति पर चलते हुए बातचीत को लंबा खींचने के पक्ष में नजर आया। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के पास संवर्धित यूरेनियम का भंडार और भौगोलिक स्थिति के रूप में अधिक विकल्प मौजूद हैं, जिसके कारण उसे किसी भी ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने की जल्दबाजी नहीं है जो उसकी शर्तों पर न हो।
अनिश्चित भविष्य और संघर्ष की आहट
इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों की यह चिंता जायज है कि दोनों पक्षों की शर्तों के बीच एक विशाल अंतर है। अमेरिका द्वारा प्रतिबंध हटाने और फ्रीज किए गए धन को जारी करने के प्रस्ताव के बावजूद, बुनियादी सुरक्षा मुद्दों पर सहमति न बन पाना निराशाजनक है। यदि यह गतिरोध बना रहा, तो 8 अप्रैल को घोषित सीजफायर के टूटने का खतरा बढ़ जाएगा। वार्ता की विफलता केवल एक कूटनीतिक हार नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र को फिर से युद्ध और अस्थिरता की ओर धकेलने वाली चिंगारी भी बन सकती है।
निष्कर्षतः इस्लामाबाद वार्ता का बेनतीजा रहना इस बात का प्रमाण है कि संप्रभुता और वर्चस्व के संघर्ष में कूटनीति अक्सर हार जाती है। दोनों ही पक्ष युद्ध की विभीषिका से बाहर निकलना तो चाहते हैं, लेकिन कोई भी अपनी मूल शर्तों पर झुकने को तैयार नहीं है। अब गेंद पूरी तरह से ईरान के पाले में है; उसे यह तय करना होगा कि वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत और आर्थिक स्थिरता चाहता है या परमाणु कार्यक्रम की जिद पर कायम रहकर भविष्य के अनिश्चित सैन्य टकराव का सामना करना चाहता है।


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