Mon, 14 Sep 2026
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चौमासा

 


चतुर्मास में मंगल कार्य निषेध माने जाते हैं।

 

 दो मुख्य कारण हैं 

१ पहला मुख्य कारण है इन मासों में वर्षा
 ऋतु के कारण आवागमन के मार्गों का 
अवरुद्ध बने रहना।जीव सूक्ष्म जीव धरती
 पर विचरण करने लगते हैं पैरों के नीचे आ कर जीव हत्या के चांसेज ज्यादा बढ़ जाते हैं।

२ दूसरा मुख्य कारण है ऋतु अनुसारदिन
चर्या मास चर्या ,जिसे आजकल लाइफ 
स्टाइल कहा जाता है, में स्वास्थ्य रक्षा के लिहाज से परिवर्तन जो धर्म कृत्य से जोड़ 
कर संस्कार बना दिया गया है।

चौमासा का आरम्भ कब से

1-आषाढ़शुक्ल एकादशी(देव शयनी एकादशी ) से या

2- द्वादशी से या

3- पूर्णिमा से या

4-सूर्य के कर्क राशि प्रवेश से आरम्भ होता है

और इस चौमासे का समापन-कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देवोत्थान एकादशी को होता है।

कुछ लोग सवाल करते हैं कि देव क्या वास्तव में शयन करते हैं ? ।   यह सगुण साकार रूप ईश्वर का एक प्रतीक कृत्य मात्र है।इसके माध्यम से ऋतुचर्या धर्म कार्य कृषि व्यवस्था व सांस्कृतिक कार्यों को समन्वित किया गया है।

सामान्य व्यक्ति निराकार ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता । इसलिए उक्त उद्देश्य से देवशयन जागरण की ललित धारणा समाज को दी गई है।

अब इन चार मासों में से पहले तीन, आषाढ़ श्रावण भाद्रपद तो वर्षा के मास हैं जबकि आश्विन( क्वार) मास में वर्षा की समाप्ति होती है।

 

इसलिए वर्षा काल से जुड़े इन चार मास में विवाह आदि शुभ कार्यों में दूरस्थ व्यक्तियों का आना दुर्गम होने से शुभ कार्य वर्जित किए गए थे।

 

 परिव्राजक संन्यासी  इस चातुर्मास में किसी पूर्व निर्धारित स्थान पर ठहर कर गृहस्थों के मार्गदर्शन के लिए नियमित प्रवचनसत्संग आदि आयोजित करते हैं। गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम का एक तरह से संगम स्थल भी है यह वर्षावास या चातुर्मास

जैन धर्म में मुनियों का चातुर्मास या वर्षावास प्रसिद्ध है। ये मुनि अपने मत के अनुयायियों को नियमित धर्म शिक्षा इन चार मासों में देते हैं। 

◆चातुर्मास में विवाह आदि शुभ कार्य भले ही नहीं सम्पन्न नहीं होते परन्तु अन्य कई त्योहार पूर्ण विधिविधान से मनाए जाते हैं-

●१ आषाढ़ मास में- जगन्नाथ पुरी ओडिशा में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ जी की रथ यात्रा जुलाई मेंआषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरम्भ होती है जो चौमासा आरम्भ होने के पहले शुरू होती है

शुक्ल एकादशी को देव शयनी उत्सव होता है और चातुर्मास व्रत भीआरम्भ होता है।इस दिन से चार मास तक साधक नित्य व्यवहार की कोई चीज उपयोग में नहीं लेने का व्रत( अर्थात संकल्प) करता है।जैसे गुड़, तेल दूध आदि।या एक समय भोजन का व्रत लेता है।ग्रामों में धर्मक्षेत्रों में औरसंस्कृति के मानने वाले व्यक्तियों में यह परम्परा अभी भी प्रचलित है।इसके ऋतुचर्या के अनुसार स्वास्थ्य से जुड़े सकारात्मक पहलू भी हैं।इस पर विस्तृत विवरण भविष्य पुराण( १/६-९)में, मत्स्य पुराणमें व्रत प्रकाश आदि में है।

आषाढ़ी पूर्णिमा को,गुरु पूजन पूर्णिमा, शिव शयन व्रत भी होता है।

●२ श्रावण मास में दूर्वा गणपति व्रत,नागपंचमी व्रत,श्रावण पूर्णिमा की रक्षाबंधन व्रत सम्पन्न होता है।

●३ भाद्रपद मास में कज्जली तीज का लोक उत्सव,कृष्ण जन्माष्टमी, हरितालिका तीज, गणेश जन्म चतुर्थी व्रत ऋषि पंचमी हल षष्ठी व्रत होता है। महालक्ष्मी अष्टमी व्रत भाद्र पद शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर पितृ पक्ष में आश्विन ( क्वार) कृष्ण अष्टमी तक सोलह दिन तक चलता है।अनंत चतुर्दशी व्रत।

●४ आश्विन मास में कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिन का पितृ पक्ष होता है जो देव ऋण ऋषि ऋण पितृ ऋण उतारने के लिए जल से तर्पण किया जाता है जबकि शुक्ल पक्ष में नवरात्र दशहरा आदि सम्पन्न होते हैं।

◆वर्षा ऋतु की लगभग समाप्ति के बाद धन धान्य की व्यवस्था भी नित्य की जरूरतों की पूर्ति के लिए करना होती है जो कृषि से प्राप्त उपज अन्न आदि से की जाती है यह कार्य कार्तिक तक ही सम्पन्न हो पाता है इसलिए कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चौमासे की अवधि रखी गई है।

●कार्तिक मास में करवा चौथ, एवम दीपावली से जुड़े कई व्रत त्योहार सम्पन्न होते हैं।शुक्ल पक्ष कार्तिक एकादशी को देवोत्थान उत्सव के साथ विवाह आदि शुभ कार्य आरंभ होते हैं और चातुर्मास व्रत भी इसी एकादशी को सम्पन्न होता है।

इस प्रकार वर्षा के तीन मास के बाद आश्विन में विजयादशमी को अस्त्र शस्त्र रथ की साज सज्जा ,दूसरे राज्यों की सीमा उल्लंधन की परम्परा थी जो वर्षा की समाप्ति के पश्चात मार्ग सुगम हो जाने का संकेतक थी।

●पर वर्षा उपरांत खेती की उपज जो मुख्यतः धान अर्थात चावल का घर में आना शेष रह जाता है जो दीपावली तक आ जाता है इसी नव धान्य से धान्या लक्ष्मी जी का पूजन होता है ।धान से बनी वस्तुएं ,खीले भी इसीलिए लक्ष्मी पूजन में अर्पित की जाती हैं।धन धान्य से भण्डार पूर्ण होने के उपरांत ही देवोत्थान एकादशी से विवाह आदि शुभ कार्य का समारंभ होता रहा है।

◆इस दृष्टि से चातुर्मास का उद्देश्य ऋतु जन्य पर्यावरणके अनुसार स्वयं को ढालना, इनका सर्वोत्तम उपयोग स्वास्थ्य रक्षक शाक दूध आदि त्याग व्रत में करना, , कृषि आधारित धन व्यवस्था करना,और आवागमन कम हो जाने से इन चारमासों का उपयोग संतों के सानिध्य से धार्मिक आध्यात्मिक ज्ञानार्जन करना रहा है।

●अब परिस्थिति बदली हैं ।पर मूल भावना को बनाए रखना हमारे लिए फिर भी फायदेमंद है इनमें आयुर्वेद अनुसार वर्षा ऋतु चर्या,दिनचर्या, रमते जोगी संतों महात्माओं का गृहस्थों के साथ समागम मुख्य हैं।

◆डॉ पांडुरंग वामन काणे के अनुसार वैदिक काल मे चातुर्मास्य नामक यज्ञ होते थे जो फाल्गुन या चैत्र ,आषाढ़ एवम कार्तिक पूर्णिमा को सम्पादित होते थे जिन्हें क्रमशः वैश्वदेव,वरूण प्रधास और साकमेघ कहा जाता था।… इन ऋतुसम्बन्धी यज्ञों में व्रती को कुछ कृत्यों का त्याग करना होता था यथा शय्या शयन, मांस,मधु, नमक ,मैथुन, एवम शरीर अलंकरण ( धर्मशास्त्र का इतिहास चतुर्थ भाग,
अध्याय छह )

निष्कर्ष; चातुर्मास या चौमासे में पहले के समय में विवाह जैसे बड़े कार्य आवागमन की सुविधा में कमी व मार्ग जोखिम के कारण नहीं किए जाते थे।

इस अवधि का अच्छा उपयोग घमन्तु सन्यासी और जैन मुनि चार माह में वर्षावास करके अर्थात एक स्थान पर रह कर गृहस्थों को आचार व्यवहार की शिक्षा देते  हैं।
धर्म तप तपस्या ज्यादा प्रभावी होती है।
जैन पररुशन 9दिन का तपस्या पर्व भी चौमासे में ही मनाया जाता है।

 

आचार्य पूजा जैन

एस्ट्रो वास्तु एनर्जी सेलेब्रिटी कंसल्टेंट

गोल्ड मेडल तथा लाइफ टाइम अचीवमेंट इंटरनेशनल मेडिटेशन मास्टर

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