Sat, 20 Jun 2026

अहंकार में जीवन बीत रहा है और हम समझ रहे हैं अमर हो करके आए हैं ।

तुलसीदास जी के इन दोहो हम विचार करें यही जय श्रीमन्नारायण

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥
लघु जीवन संबदु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥


मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥


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