Wed, 18 Mar 2026
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सन्तों की वाणी हमारा मार्ग दर्शन करती है :- योगिराज ररमेश जी

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥

गुरु वशिष्ठ 
 ने बिलखकर (दुःखी होकर) कहा- हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ा बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥.                                     ------  गुरु वशिष्ठ 

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ। 

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ ॥ 

जीवात्मा कह रही है कि ‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह
 भगवान पर न्यौछावर होते−होते मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।       ----- (संत पलटूदास)

 

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः । सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ।। 

इस श्लोक के माध्यम से चाणक्य सांप और दुर्जन की तुलना करते हैं और कहते हैं कि सांप दुर्जन मनुष्य से ज्यादा बेहतर हैll सर्प तो एक बार डसता है दुर्जन हर कदम पर काटता है                ---- चाणक्य


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