Sun, 03 May 2026
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फटे जूते फटे पहन के आकाश पे चढ़े थे सपने हमारे हरदम औकात से बड़े थे

पानी में भी चाँद सितारे उग आते हैं
आँख से दिल तक वो ज़रख़ेज़ी हो जाती है
हैदर क़ुरैशी

उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे
अंबरीन हसीब अंबर

तू अपनी शीशागरी का हुनर ना कर जाया,
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है |
अहमद फराज

हमने अपनी मुफलिसी का कुछ इस तरह रखा भरम,
वास्ते कम कर लिये मगरूर कहलाने लगे |
मुनीश महबूब 

एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं
हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है
कुँवर बेचैन

फटे जूते फटे पहन के आकाश पे चढ़े थे
सपने हमारे हरदम औकात से बड़े थे
मनोज मुंतशिर 

वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक़ था
दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से
कैफ़ भोपाली

जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है
हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं
जमुना प्रसाद राही


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