Sun, 03 May 2026
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मैं हाथ मिलों तो मिलने नही देता ,यह शहर मुझे दोस्त बनाने नही देता

मैं हाथ मिलाऊं तो मिलाने नहीं देता

ये शहर मुझे दोस्त बनाने नहीं देता

मैं डाल के आया हूं गये वक़्त के कपड़े

दरबान मुझे बज़्म में जाने नहीं देता

लगता है वो सूरज को ख़रीद आया है यारो

जो धूप में कपड़े भी सुखाने नहीं देता

तुम मेरे पिता के ज़रा जज़्बात तो देखो

जो भीड़ में साइकिल भी चलाने नहीं देता

ज्ञानप्रकाश विवेक

 

खुल के मिलने का सलीक़ा आप को आता नहीं

और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था उसे पा कर ही मैं रह जाऊँगा

उस को मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं

जा दिखा दुनिया को मुझ को क्या दिखाता है ग़ुरूर

तू समुंदर है तो है मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे आहट हो या आवाज़ दे

मेरे हाथों में मिरा घर तो है दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों

और जब ऐसा किया मैं ने तो शरमाया नहीं

उस की महफ़िल में उन्हीं की रौशनी जिन के चराग़

मैं भी कुछ होता तो मेरा भी दिया होता नहीं

वसीम बरेलवी

 

कोई पत्थर कोई गुहर क्यूँ है 

फ़र्क़ लोगों में इस क़दर क्यूँ है !

तू मिला है तो ये ख़याल आया 

ज़िंदगी इतनी मुख़्तसर क्यूँ है !

मैं तो इक मुस्तक़िल मुसाफ़िर हूँ 

तू भला मेरा हम-सफ़र क्यूँ है !

अदीम हाशमी

 

हज़ार जान से मैं तुझपे मरने वाला था, 

मैं बेख़याली में हद से गुज़रने वाला था। 

सज़ा तवील हुई ज़ुर्मे- इश्क़ में मुझको, 

मेरा गवाह भी वैसे मुकरने वाला था। 

कुरेद कर भी तुझे क्या हुआ बता हासिल, 

ये ज़ख्मे- दिल मेरा यूँ भी न भरने वाला था। 

अशोक श्रीवास्तव


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