Friday, 30 Jan 2026

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो तो ये रिश्ता निभाना किस क़दर आसान हो जाए

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो

तो ये रिश्ता निभाना किस क़दर आसान हो जाए

वसीम बरेलवी

 

 मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है

किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर

 

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

अकबर इलाहाबादी

 

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे

आलम ख़ुर्शीद

 

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

इतना दिख जाए के आंखों का गुज़ारा हो जाए

यासिर खान इनाम

 

उम्र बड़ी होती है रोने वालों की

गीली लकड़ी जलते-जलते जलती है

राजेश रेड्डी

 

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गए हैं

आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते

बशीर बद्र


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