Fri, 30 Oct 2026
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किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो तो ये रिश्ता निभाना किस क़दर आसान हो जाए

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो

तो ये रिश्ता निभाना किस क़दर आसान हो जाए

वसीम बरेलवी

 

 मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है

किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर

 

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

अकबर इलाहाबादी

 

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे

आलम ख़ुर्शीद

 

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

इतना दिख जाए के आंखों का गुज़ारा हो जाए

यासिर खान इनाम

 

उम्र बड़ी होती है रोने वालों की

गीली लकड़ी जलते-जलते जलती है

राजेश रेड्डी

 

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गए हैं

आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते

बशीर बद्र

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