Sun, 03 May 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है

मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।

मुनव्वर राना

 

ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को

सुकून याद में तेरी न भूलने में क़रार

शोहरत बुख़ारी

 

कोई न रस्ता नाप सका है, रेत पे चलने वालों का

अगले क़दम पर मिट जाएगा पहला नक़्श हमारा भी

अली अकबर नातिक़

 

भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में

उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं

गुलज़ार

 

श्राद्ध भोग हाथों लिए, पितृपक्ष असहाय 

पुरखे बनकर मिल रहे, कौआ कुत्ता गाय।

 यश मालवीय

 

हम ने भी आसमानों की सैर ख़ूब की है

कंधे नहीं पिता के होते जहाज़ से कम

हरी कुमार


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