Sun, 03 May 2026
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होने में खोने का भय समाया है: योगिराज रमेश जी

 --------- वैराग्य ही निर्भयता प्रदान करता है ----------


भोगे रोग-भयं कुले स्यूति-भयं वित्ते निपलाद-भयं माने दैन्य-भयं
बाले रिपु-भया: रूपे जराय भयम।
शास्त्री वादी-भयं गुणे खला-भय: काय कीतंताद-भयं
सर्वं वास्तु भयन्वितं भुवि नं वैराग्यं-वभयम

भोग में रोग का भय है। पारिवारिक प्रतिष्ठा में गिरने का भय रहता है। धन में राजाओं का भय होता है। प्रतिष्ठा में अपमान का भय रहता है। सत्ता में शत्रु या विरोधी का भय रहता है; सौन्दर्य में वृद्धावस्था का भय है। शास्त्र विद्वता में विद्वान विरोधियों का भय रहता है; सद्गुण में दुष्टों की निन्दा करने वाले का भय रहता है; शरीर में मृत्यु का भय है। इंसान के लिए इस दुनिया में हर चीज डर से जुड़ी है। वैराग्य (वियोग, भोगों से न चिपके रहना) ही निर्भयता प्रदान करता है।


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