Fri, 30 Oct 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

बे-फ़ैज़ इक चराग़ बताया गया मुझे

सूरज बुझा तो ढूंढ के लाया गया मुझे

उभरा हर एक बार नया फूल बन के मैं

मिट्टी में जितनी बार मिलाया गया मुझे

काग़ज़ क़लम के बीच रहा क़ैद उम्र भर

लिखा गया मुझे न भुलाया गया मुझे

हैरान हूं मैं वक़्त की तक़सीम देखकर

किसके लिए था किसपे लुटाया गया मुझे

पहले कहा गया कि लब आज़ाद हैं तेरे

मैं बोलने लगा तो डराया गया मुझे

शामिल तो कर लिया गया अहबाब में मगर

महफ़िल में सबसे दूर बिठाया गया मुझे 

इक़बाल अशहर .....

 

 

उस ने दूर रहने का मशवरा भी लिखा है

साथ ही मुहब्बत का वास्ता भी लिखा है

उस ने ये भी लिखा है मेरे घर नहीं आना

साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों में रास्ता भी लिखा है

कुछ हुरूफ़ लिखे हैं ज़ब्त की नसीहत में

कुछ हुरूफ़ में उस ने हौसला भी लिखा है

शुक्रिया भी लिखा है दिल से याद करने का

दिल से दिल का है कितना फ़ासला भी लिखा है

क्या उसे लिखें ‘मोहसिन’ क्या उसे कहें ‘मोहसिन’

जिस ने कर के बे-जाँ, फिर जान-ए-जाँ भी लिखा है

 

 मोहसिन नक़वी ......

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