Friday, 30 Jan 2026

काव्य संकलन "श्रुता"

रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को

मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी

जलील मानिकपूरी

 

गुज़िश्ता रुत का अमीं हूँ नए मकान में भी

पुरानी ईंट से तामीर करता रहता हूँ

आलम ख़ुर्शीद

 

 इतना आसाँ नहीं आसाँ होना

मुश्किलें कम नहीं आसानी की

राजेश रेड्डी

 

बहुत सस्ते में इंसान बिक रहे हैं 

हमारे यहाँ तो महंगाई नहीं हैं 

नुसरत सिद्दीकी


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