Friday, 30 Jan 2026

काव्य संकलन "श्रुता"

डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताए 

ऐसी नद्दी में उतर जाने को जी चाहता है...

इफ़्तिख़ार आरिफ़

 

ये होशियारी हमें इश्क़ ही सिखाता है

निगाह रक्खे हुए हैं नज़र में आये बग़ैर

शरिक कैफ़ी

 

वो कौन था जो दिन के उजाले में खो गया

ये चाँद किस को ढूँडने निकला है शाम से

आदिल मंसूरी

 

किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को

काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब केआ

आदिल मंसूरी


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