Sat, 07 Nov 2026
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श्रीरामचरितमानस विभीषण गीता का एक अंश : योगिराज रमेश जी

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस से विभीषण गीता का एक अंश आज प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे समझना आवश्यक है ।। विभीषण कह रहे हैं नाथ आपके पास न रथ है न जूता है किस तरह से रावण को जीतेंगे भगवान उसका उत्तर देंगे

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥

हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान्‌ वीर रावण 
किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥

शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं।।

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