Sat, 02 May 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

 वरक़ उलट दिया करता है बे-ख़याली में

वो शख़्स जब मिरा चेहरा किताब होता है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

 

रहता है ज़ेहन ओ दिल में जो एहसास की तरह

उस का कोई पता भी ज़रूरी नहीं कि हो

ताहिर अज़ीम

 

मुझे मालूम है क्यूँ हाथ ख़ुदा ने छोड़ा

साइकल यूँ ही सिखाई थी मुझे पापा ने

नवीन जोशी

 

तुम आसमाँ की बुलंदी से जल्द लौट आना

हमें ज़मीं के मसाइल पे बात करनी है

शायर जमाली


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