Sat, 07 Nov 2026
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अष्टांग योग महर्षि पतंजलि की मनुष्यता के लिए अनूठी देन :- बलराज ठाकुर

                             —- अष्टांग योग —-

महर्षि पन्तजलि  ने योग को आठ भागों  में बाँट कर “अष्टांग योग”  के रूप में  योग के मानसिक, शारीरिक और आत्मिक विकास के  विकास के लिए एक स्मग्र पद्दिति  समाज को दी। जिसको  कर की एक शैली है जिसमें सांस को गति के साथ समन्वयित करना शामिल है। यह योग का एक बहुत ही पुष्ट रूप है जिसे शारीरिक शक्ति और मानसिक स्पष्टता के निर्माण के लिए डिज़ाइन किया गया है। 
अष्टांग आठ अंग इस प्रकार है :- 
1. यम
2. ⁠नियम
3. ⁠आसन
4. ⁠प्राणायाम
5. ⁠प्रतिहार
6. ⁠धारणा 
7. ⁠ध्यान
8. ⁠समाधि
जिस में “यम” में नैतिकता  के पराये सत्य, अहिंसा आदि पाँच मानसिक शुद्धि के तरीक़े सुझाए गए हैं, “नियम” में शरीर की शुद्धि के लिए धोती, नेती आदि तरीक़ों का वर्णन किया है, इसी प्रकार अष्टांग योग के तीसरे अंग “आसान “ में शरीर आरोग्यता और ताक़त के लिए  योग के आसन सुझाए हुए हैं, चौथे अंग “प्राणायाम” में सांस संबंधी प्रक्रियाएँ  का वर्णन हैं, पाँचमे अंग “प्रतिहार” में मन की एकाग्रता के साधन बताए हुए हैं, छटे अंग धारणा मन की संकल्प शक्ति बढ़ाने की बात की है, सातवें अंग “ ध्यान” में  अंतर्मुखी यात्रा की और अग्रसर होने की विधि का उल्लेख है, और अष्टांग  योग के आख़िरी अंग समाधि में, ध्यान की गहरी अवस्था समाधि  की और वढ़ कर आत्मा की शक्ति को विकसित कर हमारे संपूर्ण विकास का रास्ता दिखाया है। : बलराज ठाकुर

Comments

Balraj Thakur15 Jun 2024 06:18am

Good

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Balraj Thakur15 Jun 2024 06:18am

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