Tue, 04 Aug 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

मैं जब भी उस की उदासी से ऊब जाऊँगी

तो यूँ हँसेगा कि मुझ को उदास कर देगा

 

 मेरी तस्वीर बनाने को जो हाथ उठता है

इक शिकन और मिरे माथे पे बना देता है

 

मैं रौशनी हूँ तो मेरी पहुँच कहाँ तक है

कभी चराग़ के नीचे बिखर के देखूँगी

 

मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं

ये बात ख़ुद पे मैं किस तरह आश्कार करूँ

 

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

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