Thu, 05 Nov 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत

जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है

नातिक़ लखनवी

 

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा

मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा

निदा फ़ाज़ली

 

मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो

मुझे मेरी रज़ा से माँगता है

परवीन शाकिर

 

ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को

अपने अंदाज़ से गँवाने का

जौन एलिया

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