Friday, 30 Jan 2026

काव्य संकलन "श्रुता"

जब तक है डोर हाथ में तब तक का खेल है
देखी  तो  होंगी  तुम  ने पतंगें कटी हुई
मुनव्वर राना

बंजारे हैं रिश्तों की तिजारत नहीं करते 
हम लोग दिखावे की मोहब्बत नहीं करते 
मिलना है तो आ जीत ले मैदान में हम को 
हम अपने क़बीले से बग़ावत नहीं करते 
तूफ़ान से लड़ने का सलीक़ा है ज़रूरी 
हम डूबने वालों की हिमायत नहीं करते 
 नसीम निकहत

दीवार ओ दर झुलसते रहे तेज़ धूप में
बादल तमाम शहर से बाहर बरस गया
इफ़्तिख़ार नसीम

ज़बाँ-बंदी के मौसम में गली-कूचों की मत पूछो
परिंदों के चहकने से शजर आबाद होते हैं
अंजुम ख़लीक़


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