---------------------- छुट्टी हिन्दुस्तान की ! ----------------
(लेखक जगदीश चन्द्र जोशी ज़्यादा छूटिओं पर (ज़ाविया-ए-नज़र) दृष्टिकोण उनकी पुस्तक { "ज़ाविया-ए-नज़र" से }
ये काठ की पुतलियाँ थीं जिनको मद्दारी रेश्म की डोरियों पर नचा रहा था और मैं ख़्याल में डूबा हैरान हुआ, के, ये सब कुछ कैसे कर पाता है मद्दारी। जल्द ही एक तस्वीर खिँच गई किसी हक़ीक़त' की, ज़हन में। एक आईना' सामने नज़र आने लगा और जिसमें अक्स दिखाई देने लगे। आईना ख़ुद कोई अक्स' नहीं बनाता। ये तो सिर्फ वही कुछ दिखाता है जो उसके रूब्रू होता है, सामने वाला चाहे किसी भी शक्ल का क्यों न हो। अगर ये तूल-ओ-अर्ज़' वाला हिन्दुस्तान रूब्रू आ जाए इस आईने के, तो इसकी भी तो सूरत नज़र आएगी जो जैसी भी हो ।
मद्दारी तमाशा दिखा रहा था और तमाशा ये था, के, स्कूल की बड़ी जमा’अर्तो' के बच्चों ने हड़ताल का ऐलान किया। अचानक होने वाली बात से हैरानगी और तश्वीर्शी तो होती ही है। स्कूल के हेडमास्टर साहिब और दीगर मास्टर-साहिबान घबराए और जल्द ही इस हड़ताल से मुतल्लिका अपने-अपने ख़्यालात का इज़हार करने लगे। सभी ने मश्वुरा दिया, के, बच्चों से गुफ़्तगू करना लाज़िम है ताके मालूम हो सके, के,माजरा की बुनयाद में क्या है। वो सभी बच्चों के सामने आए और उनके सरगना को पहचाना और पूछा उससे, के, "ये सब माजरा क्या है ?” और पूछा, के, “इस हड़ताल का आख़िर मत्तलब क्या है ?" चन्द लम्हात तक तो लीडर ख़ामोश रहा और फिर बोला, “ये हड़ताल है जैसी हड़ताल हुआ करती है, माँगें भी हैं हमारी जैसी माँगें हुआ करती हैं।जनाब आप सभी हमारे उस्ताद हैं और आप ही तो हमें नस्सीहत देते थे, के, बोलने से पहले सोचो और जो कुछ बोलो, सोच समझ कर बोलो। इन्हीं हिदायात पर अमल करते हुए
हम आपसे अर्ज़” करते हैं, के, हमें आपस में मश्वुरा करने का वक्त दो।" चन्द लम्हात
तक तो ख़ामोशी त्तारी” रही हर इन्नाफ़ क्योंके मश्वुरा का अमल जारी था लीडरान में और
फिर तुलबा का सरगना ख़ुद को तय्यार करके यूँ कहने लगा :
“ मास्टर लोग हर बात पर डंडा उठा लेते हैं, ख़ास तौर पर 'होम-टास्क' न करने पर। इसलिए घर पर स्कूल का काम देने की रिवायत बन्द करो और मास्टर लोगों की दहशतगर्दी को ख़त्म करो। यक़ीनॅन ये अमल बन्द होना ही चाहिए। दूसरी बात ये है, के, इतवार, त्योहार या मौसमी छुट्टियां नॉकाफ़ी लगती हैं हमें और इसी लिए हमारी दुसरी मांग है, के, होली की छुट्टी दीवाली तक और दीवाली की छुट्टी होली तक होनी चाहिए। ये माँग ख़ास भी हैं और अहम भी। दीगर, फ़ीस लेकर पढ़ाना तो सरासर नॉ-इन्साफ़ी है। इस मंहगाई के ज़माना में तो हमारे जेब ख़र्च भी पूरे नहीं पड़ते और इसी लिए फ़ीस लेना बन्द करो। हमारी चौथी और आख़िरी मांग है, के, छुट्टियों के दौरान मास्टर साहिबान को तन्ख्वाह सॉलम ही मिलनी चाहिए।
“इन माँगों को सुन कर हेडमास्टर झल्लाया और फिर सटपटाने लगा जब मास्टर साहिबान भी यूँ बोले : "दूसरी और चौथी मांगें तो बहुत ही जॉइज़ हैं और इनके मान लेने से पहली मांग का हॅल तो ख़ुद-बॅ-ख़ुद ही निकल आता है।" मास्टर साहिबान ने यक़ीन ये भी दिलाया, के, छुट्टियों के दौरान वो तुलबा को ट्यूशन देंगे बॅ-शर्त-ए-के उन्हें पढ़ने में दिलचस्पी हो । दीगर, इम्तिहान के वक्त भी वो करेंगे मद्दँद तुलबा की और इन्शा अल्लाह नतीजा स्कूल का अच्छा ही रह पाएगा, पहले सालों की तरह, शायद उससे भी बिहतर होगा। हेडमास्टर चिल्लाया और बे-बसी के आलम में मुँह बना कर कुछ इस तरह से कहने लगा : " राय अगर सब की यॅकसाँ है तो मेरा एतिराज़ तो बे-मॉ'नी ही हो जाता है।" बच्चों को मुखात्तब होते हुए हेडमास्टर साहिब ने फ़र्माया : "तुम्हारी दूसरी माँग क़ुबूल की और इसी के हमराह पहली का हल हो गया ख़ुद-बॅ-ख़ुद । तुम्हारी आख़िरी दो मांगें फ़ाइनैनशॅल तर्ज़ की हैं और इन्हें सरकार की मँजूरी के लिये भेजा जाएगा क्योंके ये मु'आमला मेरी तहवील से बाहर है।
“तमाशा देखा। एक बिजली सी कौंद गई दिमाग़ में और तस्सवीर खिंचने लगी हिन्दुस्तान की और इसमें रहने वाले लोगों की फ़ित्रत की। ये फ़ित्रत उभरने लगी इक शक्ल की मानिन्द वक्त के आईने में। देखना होगा इस अक्स को बड़े ग़ौर के साथ । हिन्दुस्तान के लोग छुट्टी से अज़हॅद प्यार करते हैं। शायद ये उनकी सेहत की कुँजी है। सरकारी मुलाज़मीन की दिलचस्पी है छुट्टी में और सरकार को दिलचस्पी है छुट्टी देने में। सस्ती छुट्टी देने से महँगे वोट की उम्मीद बन्धी होती है । इतिफ़ा छुट्टी, हक़्क़ी छुट्टी, अलालती छुट्टी, हड़ताली छुट्टी, जीने-मरने की छुट्टी,जलसे - जुलूसों की छुट्टी, तरह-तरह, हर तरह की छुट्टी- क्या छुट्टी हिन्दुस्तानी कल्चर है ? क्या वक्त बेकार करना, हिन्दुस्तानी मॅक्स्सद" है ? अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या है ये छुट्टी? ये छुट्टीयां क्यों होती हैं बात-बात पर, हर बात पर ?
तॉ'लीमी-इदारों में छुट्टियों का बोल-बाला है। हड़तालों की भरमार, कभी, तुलबा की, कभी उस्ताद साहिबान की। हिन्दुस्तानी फ़ित्रत मुकम्मल त्तौर पर यहां हाज़िर है। अब तो वकील, डॉक्टर, इन्जिनीयर और यहाँ तक के पुलीस वाले भी किसी से किसी त्तौर पर पीछे नहीं। किसी हाईकोर्ट के जॅज-साहिबान ने भी मज्मूई तौर पर छुट्टी से गुरेज़” नहीं किया था। ख़िदमत-ए-इन्सानी से छुट्टी डाक्टर की गिरावट है।वकील की हड़ताल मुवक़िल' से साफ़ धोका है। इन्जिनीयर के लिए कहना होगा, के,काम ख़त्म करने में वक्त की पाबन्दी इनका उसूल नहीं, चाहे प्रॉजेक्ट की क़ीमत में ॐ जाविया-ए-नज़र सरासर नॉ-इन्साफ़ी है। इस मंहगाई के ज़माना में तो हमारे जेब ख़र्च भी पूरे नहीं पड़ते और इसी लिए फ़ीस लेना बन्द करो। हमारी चौथी और आख़िरी मांग है, के, छुट्टियों के दौरान मास्टर साहिबान को तन्ख्वाह सॉलम ही मिलनी चाहिए।"इन माँगों को सुन कर हेडमास्टर झल्लाया और फिर सटपटाने लगा जब मास्टर साहिबान भी यूँ बोले : "दूसरी और चौथी मांगें तो बहुत ही जॉइज़ हैं और इनके मान लेने से पहली मांग का हॅल तो ख़ुद-बॅ-ख़ुद ही निकल आता है।" मास्टर साहिबान ने यक़ीन ये भी दिलाया, के, छुट्टियों के दौरान वो तुलबा को ट्यूशन देंगे बॅ-शर्त-ए-के उन्हें पढ़ने में दिलचस्पी हो । दीगर, इम्तिहान के वक्त भी वो करेंगे मद्दँद तुलबा की और इन्शा अल्लाह नतीजा स्कूल का अच्छा ही रह पाएगा, पहले सालों की तरह, शायद उससे भी बिहतर होगा। हेडमास्टर चिल्लाया और बे-बसी के आलम में मुँह बना कर कुछ इस तरह से कहने लगा : " राय अगर सब की यॅकसाँ है तो मेरा एतिराज़ तो बे-मॉ'नी ही हो जाता है।" बच्चों को मुखात्तब होते हुए हेडमास्टर साहिब ने फ़र्माया : "तुम्हारी दूसरी माँग क़ुबूल की और इसी के हमराह पहली का हल हो गया ख़ुद-बॅ-ख़ुद । तुम्हारी आख़िरी दो मांगें फ़ाइनैनशॅल तर्ज़ की हैं और इन्हें सरकार की मँजूरी के लिये भेजा जाएगा क्योंके ये मु'आमला मेरी तहवील सेबाहर है।"तमाशा देखा। एक बिजली सी कौंद गई दिमाग़ में और तस्सवीर खिंचने लगी
हिन्दुस्तान की और इसमें रहने वाले लोगों की फ़ित्रत की। ये फ़ित्रत उभरने लगी इक शक्ल की मानिन्द वक्त के आईने में। देखना होगा इस अक्स को बड़े ग़ौर के साथ । हिन्दुस्तान के लोग छुट्टी से अज़हॅद प्यार करते हैं। शायद ये उनकी सेहत की कुँजी है। सरकारी मुलाज़मीन की दिलचस्पी है छुट्टी में और सरकार को दिलचस्पी है छुट्टी देने में। सस्ती छुट्टी देने से महँगे वोट की उम्मीद बन्धी होती है । इतिफ़ा छुट्टी, हक़्क़ी छुट्टी, अलालती छुट्टी, हड़ताली छुट्टी, जीने-मरने की छुट्टी, जलसे - जुलूसों की छुट्टी, तरह-तरह, हर तरह की छुट्टी- क्या छुट्टी हिन्दुस्तानी कल्चर है ? क्या वक्त बेकार करना, हिन्दुस्तानी मॅक्स्सद" है ? अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या है ये छुट्टी? ये छुट्टीयां क्यों होती हैं बात-बात पर, हर बात पर तॉ'लीमी-इदारों में छुट्टियों का बोल-बाला है। हड़तालों की भरमार, कभी, तुलबा की, कभी उस्ताद साहिबान की। हिन्दुस्तानी फ़ित्रत मुकम्मल त्तौर पर यहां हाज़िर है। अब तो वकील, डॉक्टर, इन्जिनीयर और यहाँ तक के पुलीस वाले भी किसी से किसी त्तौर पर पीछे नहीं। किसी हाईकोर्ट के जॅज-साहिबान ने भी मज्मूई तौर पर छुट्टी से गुरेज़” नहीं किया था। ख़िदमत-ए-इन्सानी से छुट्टी डाक्टर की गिरावट है।वकील की हड़ताल मुवक़िल' से साफ़ धोका है। इन्जिनीयर के लिए कहना होगा, के,काम ख़त्म करने में वक्त की पाबन्दी इनका उसूल नहीं, चाहे प्रॉजेक्ट की क़ीमत में इज़ाफ़ा हो जाए या अवाम पर बोझ पड़े। पुलीस के मुत्तल्लिक़" गर न ही कहा जाए तो बिहतर है। आँख के अन्धे को दिखाएँ तो दिखाएँ कैसे?
सरकारी बड़े अफ़सरों को सियासी ऑफ़ाओं की ख़िद्मत में लुत्फ़ आता है। उनका दस्तर-बरदार होने का गोया हॅक़-ए-आईन हॉस्सिल हो उन्हें । अस्सल काम से छुट्टी, बे-काम से काम। ऊपर से हुक्म इनके लिए क़ानून-ए-अव्वल है, अस्सल क़ानून से भी ऊँचा। अवाम की ख़िदमत से छुट्टी, मानो, हिन्दुस्तान की ही हो रही हो -‘छुट्टी'।
लोक-सभा, राज्य-सभा और सूबाई विधान-सभाओं में क्या होता रहा है और क्या हो रहा है आजकल! पहले जहाँ किसी मुद्दे पर बहॅस किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए होती थी शाइस्तगी के साथ, अब वहाँ होते हैं ग़ैर-ज़रूरी 'वॉक-आऊट' और ग़ैर-ज़रूरी मुद्दों पर ग़लत इक्साम" के बहस-मुबाहसे। हुकूमत पलटने का जुनून हॉवी हो जाता है मुख़ालिफ़॰ पार्टियों पर जुमादारी निबाहने के मुक़ाबले में। नुमायंदों में मुल्क के मफ़ाद' का जोश नहीं होता और इन नाम-निहाद" होशमन्दों में होश नहीं होता। काम कम, बहस- ज़्यादा, रौशनी कम, गर्मी ज़्यादा। ये तस्सवीर है हमारे इन इदारों की। ये आईना है हमारे नुमायंदों के कामों का, यॉ'नी अस्सल काम से छुट्टी का बोल-बाला। हिन्दुस्तान के लोगों का वाहॅद मालक है ख़ुदा, क्योंके अब तो सहारा है
वही निराकार क्योंके नुमायंदे अवाम के तो खो चुके हैं अपना वक़्क़ार ।
क़ौमें तो क़ुर्बानी” से, मेहनत से और ईमानदारी से बना करती हैं, आराम-परस्ती से नहीं। अगर तरक़्क़ी-यॉफ़्ता मुल्क कुछ भी कर सकने की क़ाबिलीयत71 रखते हैं तो मुल्क-ए-हिन्दुस्तान वो सब कुछ क्यों नहीं कर सकता ? आख़िर इस मुल्क में या इसके बॉशिन्दों में कमी क्या है ? जवाब है, के, कमी है क़ौम बनने की, क़ौमी कुव्वत की, कमी है सही सियासत की, कमी है जुम्मेदारी की, कमी है काम करने के कल्चर की,कमी है मुल्क की जानिब ईमानदारी की और कमी है मुल्क की न सोच कर अपने को तर्जीह देने की। कमियाँ तो बहुत हैं, लेकिन कमी कहाँ नहीं होती ? कमी तो दर-अस्सल तब खटकती है जब कमी को ख़त्म करने की ख़्वाहिश भी नहीं होती।हमारा हिन्दुस्तान, छुट्टियों का प्यारा हिन्दुस्तान, कमियों का मारा हिन्दुस्तान और ख़ुद-गर्जी" से हारा हिन्दुस्तान। अगर ये सब कुछ ऐसा ही है तो इन कमियों को मिटाने के लिए क्या-क्या करना होगा ?
वॉहद रास्ता यही है, के, मुल्क की सालमीयत, तरक़्क़ी और अवाम की • बिहबूदी के लिए हर एक को ख़ुद-ग़र्ज़ी के चुंगल से निकल कर क़ौमी कैरिक्टर को• उभारना होगा, मुल्क के क़ानून की हद में रह कर क़ानून का नॉफ़ज़ होना लाज़िम है सब को राह-ए-रास्त" पर लाने के लिए। क़ानून की नज़र में सब बराबर हों, क्या सियासतदान, क्या मुल्क के अफ़सरान और क्या अवाम । इस तरह से ख़ामियों को मिटाना होगा, क़ौम को बुलन्दी पर ले जाना होगा, इस हॅद तक, के, हर शख़्स यहाँ {का कहने लगे, के, वो अव्वलीन हिन्दुस्तानी है और कहे, के, "हम बुल्बुलें हैं इसकी, ये गुलस्ताँ हमारा", लेकिन ऐसा कहने के लिए हर हिन्दुस्तानी को हो काम से काम, काम से प्यार, छुट्टी से नहीं ।






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